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लाशों की सरकारी लीपापोती और असहाय गोपालगंज।

बिहार का गोपालगंज आज शराब की कालाबजारी का सबसे बड़ा गढ़ बना अपने ही गोद में 60 लाशों को लिए रो रहा है। 60 लाश सुन कर अजीब लग रहा है न? अजीब लगेगा पर अजीब है नहीं। प्रशासन और भारत की महाईमानदार मिडिया 16 से ले कर 20 तक का आंकड़ा दे रही है, पर सच्ची संख्या साठ से ऊपर है। जहरीली शराब से मौत की यह घटना जिस जगह हुई है न, वहां से थाना, DM और SP ऑफिस आधा किलोमीटर की दूरी पर है। सारा गोपालगंज जानता था कि शराबबन्दी के बाद यहां धड़ल्ले से नकली शराब बिकती है। नही जानता था तो सिर्फ वह प्रशासन, जिसके अधिकांस सिपाही भी उसी जगह से छीन कर शराब पीते थे। थाना ही क्यों, वहां से मात्र सौ कदम की दूरी पर बिहार के सबसे बड़े अख़बार का दफ्तर है । सारे जिले को पता था कि यहां शहर भर के सारे मवाली रोज शाम को जुटते हैं, शराब खरीद कर पीते हैं, औरतों पर फब्तियां कसते हैं, रात को अकेले जाते लोगों का पैसा छीनते हैं, पर चालीस कदम पर बैठे पत्रकार साहब को यह बात मालूम नही थी।

Gopalganj : Crowd outside Sadar Hospital where 12 people died after drinking poisonous liquor in Gopalganj district of Bihar on Wednesday. PTI Photo
Gopalganj : Crowd outside Sadar Hospital where 12 people died after drinking poisonous liquor in Gopalganj district of Bihar on Wednesday. PTI Photo

मिडिया को भी छोड़िये, इस जगह से दो सौ कदम के दायरे में बिहार की तीनों बड़ी पार्टियों का दफ्तर है और गरीबों की मसीहा लाल पार्टी का दफ्तर तो और भी नजदीक है। आज बहती गंगा में हाथ धोने सब उतर गए हैं पर चार दिन पहले तक किसी के मुह में जबान नही थी। शराबबन्दी के बाद वहां के आम लोगों ने दसों बार इसके खिलाफ आवाज उठाई थी, वह आवाज न किसी सिपाही को सुनाई दी, न किसी पत्रकार को सुनाई दी, न हीं किसी नेता को । सारा गोपालगंज जानता है कि मरने वालों की संख्या साठ के आसपास है पर साहबों की जानकारी सोलह तक ही है।

प्रशासनिक लीपापोती की हद देखिये, शराब पीने से जब लोगों की तबीयत बिगड़नी शुरु हुई तो कुछ इधर, कुछ उधर, कुछ किसी प्राइवेट अस्पताल में तो कुछ सीवान, कुछ गोरखपुर एडमिट हुए और मरे। दूसरे दूसरे अस्पतालों या घर पर ही मर जाने वालों के घर पुलिस के चौकीदार पहुच कर धमकी देते हैं कि अगर गलती से भी किसी से कह दिए कि यह शराब पीने से मरा है तो घर भर के लोग जेल जायेंगे। प्रशासनिक खौफ का आलम यह है की दो घंटे के अंदर लगभग चालीस लाशें दफना/जला दी जाती हैं। घटना के तीन दिन बाद तक किसी की हिम्मत नही कि सही बात बता सके।

बिहार के महाईमानदार पत्रकार भी उन्ही सोलह लाशों की जानकारी देते हैं जो सदर अस्पताल में पड़ी हैं। उसके बाद की उन्हें कोई जानकारी नहीं। घटना के दिन प्रशासनिक झूठ में साथ निभाता मिडिया भी कहता है मौत का कारण शराब नही है, शरीर में अल्कोहल नही मिला है। पर अगले दिन बवाल बढ़ जाने पर वही मिडिया प्रशासन की बखिया उधेड़ने लगती है और तब उसे तनिक भी शर्म नही आती। अब प्रश्न यह है कि इस पूरी अनियमितता के लिए क्या सिर्फ प्रशासन दोषी है? क्या मिडिया, राजनितिक दल की कोई जवाबदेही नही?

बताता चलूँ कि शराब की दुकानों का एक साल के लिए मार्च के महीने में लाइसेंस मिलता है और एक अप्रैल से दुकाने चलती हैं। इस साल बिहार में शराबबन्दी होने के बाद उत्तर प्रदेश में सारे नियम कानून को ठेंगे पर रखते हुए बिहार बॉर्डर पर लगभग चालीस नई दुकानों को लाइसेंस दिया गया जून के महीने में। लॉटरी लगा कर इन दुकानों का लाइसेंस बटा और एक एक दुकान के लिए चालीस चालीस लाख का शुल्क तय और जमा हुआ। यह चालीस लाख प्रति माह जमा होते हैं। आप इन दुकानों की बिक्री और मुनाफे का अंदाजा लगाते रहिये, पर यह जान कर आपकी आँखे फ़टी रह जाएँगी कि इन सारी नई दुकानों का लाइसेंस बिहार के शराब व्यवसाइयों को मिला है। मैं बिहार का एक आम आदमी इतनी हिम्मत नही रखता कि उनका नाम ले सकूँ, पर इतना समझ लीजिये कि ये सारे व्यवसाई राजनितिक पार्टियों में नेता हैं। अच्छी पार्टी में भी और बुरी पार्टी में भी। इन सभी नई दुकानों का सारा माल बिहार आता है, चाहे जैसे भी आये। पुलिस रोड चेक करती है तो तस्कर ट्रेन से लाते हैं, ट्रेन चेक होता है तो खेतों के रास्ते लातें हैं।

सब जानते हैं इस धंधे का सरगना कौन है, पर प्रशासन की भी कुछ सीमाएं हैं शायद।

एक और आश्चर्यजनक बात बताएं, मरने वालों में लगभग सभी दलित और अल्पसंख्यक हैं। एक याकूब मेनन के लिए आग लगा देने वाले देश के बुद्धिजीवी डेनमार्क की शराब पी कर सोये हुए हैं। गुजरात में किसी एक ब्यक्ति की पिटाई पर आग लगा देने वाले योद्धाओं के पास भी इधर देखने की फुरसत नहीं है।

हर बात में जाति घुसा देने वाले कथित बुद्धिजीवी पत्रकार चुप हैं, हर बात में धर्म खोजने वाले नेता चुप हैं, जानते हैं क्यों? क्योकि ये सब गरीब थे। इनकी लाशों में चटक मशाला नहीं है सो कोई इस मुद्दे को चखने को तैयार नही है।
यही गरीबों की नियति है शायद…
यही गोपालगंज की नियति है शायद……
मुख्यमंत्री की एक अच्छी पहल का दंड भुगत रहा है गोपालगंज, महाराज फत्ते शाही का योद्धा गोपालगंज………

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

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